क्या तुमने कभी ऐसी खामोश जगह की कल्पना की है, जहाँ कुछ भी न हो? यहाँ तक कि धूल का एक कण भी नहीं। धरती शायद वैसी ही दिखती होगी, जैसी उसके बनने के समय रही होगी। एक शांत, खामोश ग्रह।
फिर ईश्वर ने मिट्टी बनाई, धूल बनाई और उसी धूल से चट्टानें भी बनाईं। मिट्टी से पौधे पैदा किए। अलग-अलग तरह की मिट्टी, पेड़-पौधे, फूल और न जाने कितनी चीज़ें बनाईं।
क्या हम उस खुशी की कल्पना कर सकते हैं, जो ईश्वर को पहला पौधा पैदा होने पर हुई होगी?
ईश्वर को विविधता पसंद है। शायद उन्होंने अपनी धरती की खूबसूरती के बारे में सोचा होगा। वाह! मेरा ग्रह कितनी विविधताओं से भरा हुआ है। फिर उन्होंने प्रकृति से जानवरों को बनाया और आखिर में इंसान को।
ईश्वर ने इंसान को बुद्धि देकर उसे इस धरती का राजा बनाया। शायद उन्होंने सोचा होगा कि इंसान इस ग्रह पर मेरा प्रतिनिधि बनकर रहेगा। वह मेरी प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जंतुओं का ख्याल रखेगा।
इंसान के पास एक बहुत ताकतवर चीज़ है, और वह है उसकी बुद्धि। अगर इंसान के पास बुद्धि न हो, तो फिर उसमें और दूसरे जानवरों में फर्क ही क्या रह जाएगा?
इंसान कितना खुशनसीब है! ईश्वर ने इस धरती को स्वर्ग जैसा बनाने की योजना बनाई। इंसान भौतिक दुनिया में तरक्की कर सके, इसलिए उसे पूरी धरती पर आगे बढ़ने और अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करने का अवसर दिया।
साथ ही, ईश्वर ने इंसान को आध्यात्मिक तरक्की का रास्ता भी दिया। इसके लिए कुछ अभ्यास और तरीके बताए, जिनका मकसद खुद को पहचानना और यह समझना है कि हमें किसने बनाया है, वह ईश्वर कौन है जिसने हमें जीवन दिया।
जगह-जगह, भाषा-बोली के साथ ये तरीके भी अलग-अलग होते गए। धीरे-धीरे इंसान ने इन्हें एक नाम दिया—धर्म।
सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन फिर इंसान की इच्छाएँ बढ़ने लगीं। इन इच्छाओं ने उसे अपनी प्रकृति, पर्यावरण और यहाँ तक कि ईश्वर को भी भुला दिया।
जबकि ईश्वर ने इंसान को प्रकृति की देखभाल करने के लिए उसका रखवाला बनाया था।
क्या तुमने कभी अलग-अलग फूलों को आपस में लड़ते हुए देखा है? गुलाब, चमेली और कमल क्या एक-दूसरे से नफरत करते हैं? क्या वे इस बात पर लड़ते हैं कि कौन सबसे सुंदर है?
अगर नहीं, तो फिर अलग-अलग धर्मों को मानने वाले इंसान आपस में क्यों लड़ते हैं?
क्या उन्होंने पवित्र भगवद्गीता और महा उपनिषद को नहीं पढ़ा? महा उपनिषद के अध्याय 6, श्लोक 71–72 में यह भाव मिलता है कि पूरी दुनिया एक परिवार है।
इसी तरह, अगर हम पवित्र कुरआन की सूरह अन-निसा, आयत 1 को देखें, तो उसमें बताया गया है कि ईश्वर ने इंसानों को एक ही जान से पैदा किया।
फिर हम आपस में लड़ कैसे सकते हैं?
हम सब भाई-बहन हैं।
खैर, चलो अब अपने असली विषय पर वापस आते हैं।
ईश्वर को विविधता पसंद है। इसीलिए उन्होंने अलग-अलग तरह की मिट्टी, पेड़, जानवर, फूल और संस्कृतियाँ बनाईं।
प्रकृति की रक्षा करना इंसान का फर्ज़ था।
जब हम किसी धर्म में जानवर की कुर्बानी की बात सुनते हैं, तो क्या इसका मतलब सिर्फ किसी जीव की बलि देना है? शायद इसके पीछे एक और गहरा अर्थ भी है।
इंसान के भीतर भी जानवरों जैसी इच्छाएँ होती हैं—लालच, क्रोध, अहंकार और अपनी चाहतों के पीछे भागते रहने की आदत। ईश्वर हमसे इन्हीं बुरी इच्छाओं को कुर्बान करने की उम्मीद करते हैं।
पवित्र कुरआन की सूरह अर-रहमान (55:7–8) इंसान को याद दिलाती है कि वह प्रकृति के संतुलन को बिगाड़े नहीं। इसी तरह, पवित्र गीता (6:17) संतुलित जीवन जीने, अपने व्यवहार में संयम रखने और जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देती है।
एक अच्छा राजा अपनी प्रजा का ख्याल रखता है। और इस धरती पर इंसान को भी कुछ ऐसी ही जिम्मेदारी दी गई थी।
लेकिन इच्छाओं ने इंसान को एक बुरा राजा बना दिया।
पैसे और अपने फायदे के लिए इंसान जंगल काटता चला गया। उसने प्रकृति को नुकसान पहुँचाया, पेड़ों को गिराया और उस पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया, जिसकी रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी थी।
आज हम ग्लोबल वार्मिंग के दौर में जी रहे हैं।
तो क्या इसके लिए हम ईश्वर को दोष दे सकते हैं?
नहीं, मेरे दोस्त। बिल्कुल नहीं।
ईश्वर ने हमें ज़रूरत की हर चीज़ दी। लेकिन हमारी बढ़ती इच्छाओं ने पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया।
जब बाढ़ आती है, चक्रवात आते हैं या बीमारियाँ फैलती हैं, तब हम ईश्वर की ओर दौड़ते हैं। उनसे रहम की दुआ करते हैं। कभी-कभी तो अपनी परेशानियों के लिए उन्हें ही दोष देने लगते हैं।
लेकिन ज़रा सोचो, हमारी इस नासमझी पर ईश्वर क्या सोचते होंगे? शायद उन्हें हम पर गुस्सा आता होगा, या शायद वे हमारी नादानी पर मुस्कुराते होंगे।
क्योंकि प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ना आखिरकार खुद अपने ही विनाश का रास्ता तैयार करना है।
पवित्र कुरआन की सूरह अर-रअद (13:11) में बताया गया है कि ईश्वर किसी कौम की हालत तब तक नहीं बदलता, जब तक वे खुद अपनी हालत बदलने की कोशिश नहीं करते।
और पवित्र गीता (6:5) में भी इंसान को खुद अपना उत्थान करने का संदेश दिया गया है। इंसान खुद अपना मित्र भी बन सकता है और खुद अपना शत्रु भी।
हम इंसान इस धरती के रखवाले हैं। हमारे पास एक खूबसूरत नेमत है—हमारी बुद्धि।
हाँ, हमने नुकसान तो बहुत कर दिया है। लेकिन अभी भी वक्त है।
हम अब भी अपनी गलतियों को सुधार सकते हैं। प्रकृति को फिर से सँवार सकते हैं और इस धरती को वैसा खूबसूरत ग्रह बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जैसा शायद ईश्वर ने हमारे लिए चाहा था।
आओ, इस दुनिया में शांति का संदेश फैलाएँ। इंसानियत और रहमदिली की आवाज़ को हर तरफ पहुँचाएँ।
वरना एक दिन हमारी धरती हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी।
इंसान को एक-दूसरे का ख्याल रखना चाहिए। अगर हम एक-दूसरे से प्यार करना और एक-दूसरे की परवाह करना शुरू कर दें, तो शायद ईश्वर भी हम पर अपनी रहमत बरसाएँगे।
इस धरती पर कोई भी पराया नहीं है।
हम सब भाई-बहन हैं। हम सब एक ही परिवार का हिस्सा हैं।
आओ, इस खामोशी को तोड़ें। अपनी धरती को फिर से जीवंत बनाएँ, ताकि हमारा ग्रह हमेशा के लिए एक खामोश ग्रह बनकर न रह जाए।
आओ, एक-दूसरे से सीखें। गले मिलें, मुस्कुराएँ, साथ बैठकर खाना खाएँ। अपने मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे को अपनाएँ।
और आखिर में, अपनी-अपनी विविधताओं को साथ लेकर, एक-दूसरे की अलग पहचान का सम्मान करते हुए, ईश्वर के दरबार की ओर चलें और मिलकर दुआ करें।
क्योंकि खूबसूरती एक जैसे होने में नहीं, बल्कि अलग-अलग होते हुए भी एक साथ रहने में है।
शुक्रिया।
मेरे लेख को पढ़ने के लिए धन्यवाद!
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