जब कुछ अल्फ़ाज़ लिखने के लिए आँखें बंद कीं तो एक बुज़ुर्ग दिखे। उस बुज़ुर्ग ने life का सबसे बड़ा lesson सिखाया। मैं रोज़ाना अपना laptop खोलता, आँखें बंद करता और उस बुज़ुर्ग से गुफ़्तगू करता। आज इसी article में उसी गुफ़्तगू को summarise करने की कोशिश करता हूँ।
जब मैं रास्ते से जा रहा था, बीच वीरान जगह एक बड़ा पेड़ दिखा। मैं देखकर हैरान रह गया। मुझे साए की तलाश थी, सोचा ऊपरवाले ने मेरे लिए ही बनाया है। मैं उस पेड़ के नीचे जाकर बैठा और अपनी water bag निकाली, लेकिन water bag में सिर्फ़ एक बूँद पानी था। मैं थोड़ा परेशान हुआ। तभी एक हाथ बिल्कुल मेरे नज़रों के सामने दिखा। मैंने देखा तो एक बुज़ुर्ग चाचा मुझे पानी offer कर रहे थे।
जब भूख-प्यास होती है तो कौन-सी formality आपको याद आती है? मैंने तुरंत bottle उठाई और पूरा पानी पी गया। मुझे इतनी राहत और सुकून महसूस हुआ, जो कभी नहीं हुआ था।
मैं उस बुज़ुर्ग चाचा को thank you बोलना चाहता था, लेकिन पानी पीने के बाद आँख खोलते ही वो वहाँ से चले गए थे। मेरे हाथ में थी पानी की bottle, जो उस चाचा की थी।
मैंने सोचा कि शायद चाचा जल्दी में होंगे, तो निकल गए होंगे। कोई नहीं, मैं फिर कल इसी जगह आऊँगा और चाचा को thank you बोलकर उनकी bottle लौटा दूँगा।
मैं दूसरे दिन आया, उसी पेड़ के सामने। इस बार सिर्फ़ मुझे पेड़ के नीचे की गीली ज़मीन दिखी। मुझे ये confirm हो गया कि चाचा आज भी आए थे, लेकिन मैं late हो गया था।
मैंने सोचा, आज मैं यहाँ से जाऊँगा ही नहीं।
दूसरे दिन similar time पर मैंने किसी के आने की आहट सुनी। मैंने सोचा थोड़ा दूर जाकर देखता हूँ। मैं थोड़ा दूर गया, उतने में बुज़ुर्ग आए और पेड़ को पानी पिलाने लगे। पेड़, जो हरा-भरा, बड़ा सा था, उसे पानी पिलाने लगे।
मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ। इतनी गर्मी में, वीरान जगह में कोई पानी पिलाने, वो भी पेड़ को, कैसे आता होगा?
मैं थोड़ा नज़दीक गया। बुज़ुर्ग को ही बोला, “कैसे हो?”
बुज़ुर्ग ने कोई ख़ास reaction नहीं दिया, जब तक कि उनकी बाल्टी खाली नहीं हुई।
मैंने फिर बुज़ुर्ग को पूछा, “कैसे हो चाचा?”
चाचा ने कहा, “बस पौधे को पानी पिलाते रहना।”
मुझे फिर से ताज्जुब हुआ। ये कैसा जवाब है और इसका मतलब क्या है?
मैं पूछने गया, तब तक तो चाचा निकल गए।
मेरे दिमाग़ में अजीब सी बेचैनी जाग उठी। मैंने सोचा, इसका जवाब तो मैं लेकर रहूँगा।
मैंने time note किया और ठीक उसी time वहाँ गया। चाचा पेड़ को पानी पिलाएँ, उससे पहले मैंने चाचा का हाथ थाम लिया।
चाचा गुस्सा हो गए और गुस्से में मुझे धक्का मार दिया।
मुझे बहुत बुरा लगा। मैं वहाँ से निकलने ही वाला था कि चाचा ने मेरा हाथ थामा और कहा, “आज तुम इस पेड़ को पानी पिलाओगे।”
मैंने सोचा, ये क्या बात हुई भाई?
लेकिन चाचा ने मुझे पानी पिलाया था, तो सोचा चलो आज एहसान चुका देता हूँ। और फूले हुए मुँह से पानी पेड़ को डाल दिया और साथ में bottle भी लौटा दी और thank you बोलकर वहाँ से निकला।
चाचा ने आवाज़ दी, “क्यों बुरा लगा?”
मैंने मुड़कर देखा तो चाचा बड़ी smile किए खड़े थे।
अब ऐसी smile से मेरा दिल पिघल गया और मैंने कहा, “अब ऐसे कोई धक्का मारेगा तो कोई भी गुस्सा होगा।”
चाचा बोले, “यही तो problem है हम इंसानों की। आज की भाग-दौड़ भरी दुनिया में सब्र जैसा लफ़्ज़ ही भूल गए हैं। मेरा काम इस प्यासे पेड़ को पानी पिलाना था, तुमने इसमें बाधा डाली, मुझे गुस्सा आया और मेरा भी सब्र टूटा।”
लेकिन ख़ैर, मैं भी तो इंसान हूँ।
मैंने curiosity से पूछा, “लेकिन चाचा, आपने कहा पौधे को पानी पिलाते रहना, इसका मतलब समझ नहीं आया।”
चाचा मुझे अपने flashback में ले गए।
चाचा बोले, “मैं जब छोटा था, शायद 8-10 साल का, तब हमारी school में से सारे बच्चों को Environment Day पर इस जगह पौधे लगाने का काम दिया गया।
हम सबने ख़ुशी-ख़ुशी पौधे लगाए।
मुझे मेरा पौधा बहुत प्यारा था। मैं रोज़ाना पानी पिलाने आता था और मेरे सारे दोस्त अपने-अपने पौधों को पानी पिलाने आते थे।
फिर साथ में खेलते थे, मस्ती करते थे, बहुत मज़ा करते थे।
ज़िंदगी में कोई tension नाम की चीज़ ही नहीं थी।
हमारे पौधे भी फल रहे थे, फूल रहे थे।
लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया, बच्चे कम हो गए। आधे से ज़्यादा बाहर पढ़ने चले गए और कुछ हम थे जो पानी पिलाने आते थे।
लेकिन क्योंकि उस time पर हमें चलकर आना होता था, एक बाल्टी पानी लेकर आ सकते थे।
और हम इंसान पैदाइशी selfish ठहरे। हम पहले हमारा सोचते हैं, तो हम सिर्फ़ हमारे पौधों को पानी पिलाते थे। बाकी सारे पौधे सूख गए।
फिर मेरी college ख़त्म हुई, मैं काम पर लगा, job शुरू हुई और मैं इतना busy हो गया कि मैं भी मेरे पौधे को भूल गया।
मैंने तरक्की बहुत की, लेकिन तरक्की के साथ थोड़ी greediness, थोड़ा burden, सब बढ़ गया।
शुरू में अच्छा लगा, लेकिन जैसे ही ज़िंदगी आगे बढ़ी, अजीब सी बेचैनी शुरू हुई।
घर में पैसा तो आया, गाड़ी आई, सब आया, लेकिन जो सुकून था ना, वो चला गया।
मैंने सोचा शायद काम के load की वजह से होगा।
तो मैंने smoking try की, शराब भी try की, लेकिन बात नहीं बनी।
वही temporary relief और फिर बेचैनी शुरू।
आईने के सामने देखता तो सिर्फ़ शक्ल नज़र आती, शख़्स नहीं। शख़्स जैसे मुर्दा इंसान, जो सिर्फ़ पैसों और कामयाबी के पीछे दौड़ रहा था।
जो अंदर की रूह को भूल गया था।
वो रूह तड़प रही थी, मर रही थी।
फिर मेरे वालिद की death हो गई।
जब मैं उस incident पर घर आया तो कब्रिस्तान से लौटते रास्ते में इस जगह को देखा।
मैंने इस पौधे को देखा तो सूख रहा था।
बाकी सारे पौधे सूख गए थे, बस इसमें थोड़ी सी जान बची थी।
मैं घर गया।
वो बाल्टी अभी भी आँगन में पड़ी थी।
मैं रो रहा था।
मैंने उस बाल्टी को उठाया और उसमें पानी भरा।
गाड़ी की चाबियाँ छोड़, मैं फिर से चलकर यहाँ आया।
मैंने इस पौधे को पानी पिलाया और पौधे ने जैसे कोई दुआ दी हो, इतनी सुकूनियत मिली।
मैंने फ़ैसला कर लिया।
मुझे वही काम करना है जिसमें पैसे भले कम मिलें, लेकिन रूह को सुकून मिले।
वैसे मैं अपने काम को प्यार करता था, लेकिन वो मेरे 24 hours में से 12-14 hours ले लेता था और बाकी का time खाना-पीना-सोना।
तो मैंने सोचा, मैं अब freelancing करूँगा, अपने गाँव से ही, और रोज़ाना आकर इस पौधे को पानी पिलाऊँगा।
तो पिछले 60 साल से मैंने ये routine बना लिया।
सुबह आकर पानी पिलाओ, इस पौधे से बात करो, फिर काम करो, फिर शाम को आकर फिर थोड़ी गुफ़्तगू करो।
Retired होने के बाद तो मैं यहीं पड़ा रहता था।
लेकिन इस दौरान ये पौधा पेड़ बन गया था।
आस-पास कोई पेड़ नहीं, सिर्फ़ एक ही पेड़।”
चाचा की आँखों में आँसू थे।
मैंने उन्हें hug किया।
मैंने सोचा पेड़ कैसे बात करता होगा, लेकिन पेड़ ने जैसे मेरी सुन ली हो।
पेड़ बोला, “अभी भी तुझे समझ नहीं आया, पौधे को पानी पिलाते रहना?”
“मैं तो symbolic हूँ।
असल पौधा तेरी अपनी ज़िंदगी है।
जिस तरह इस चाचा ने अपनी ज़िंदगी का सुकून छोड़कर rat race में लगे थे, आप सब इस rat race में लगे हो और इसी race में अपना सुकून खो चुके हो।
इतने सारे बच्चों ने पौधे उगाए, लेकिन सब rat race में उलझ गए।
उतने में एक चाचा को realise हुआ और आज मैं पेड़ बना।
ठीक उसी तरह तुम्हारी soul, तुम्हारी ज़िंदगी एक पौधा है।
थोड़ा वक़्त निकालकर उसे पानी दो, यानी उसके साथ time spend करो।
उसके साथ बात करो।
फिर तुम्हें भी इस सुकून की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा।
कोई नशा तुम्हें सुकून नहीं देगा, सिर्फ़ तुम्हारा पौधा सुकून देगा।
इसलिए पौधे को पानी पिलाते रहना।”
चाचा ने दुआ दी और वहाँ से निकल गए।
मैंने आँख खोली और मुझे जैसे मेरी ज़िंदगी का clear message मिल गया था।
मेरे पौधे का पानी लिखना था।
अपने keyboard के ज़रिए इस पौधे को पानी पिला रहा हूँ।
ज़िंदगी में अब कोई क्या सोचता है, फ़र्क नहीं पड़ता।
बस इस पौधे को पेड़ बनाना है।
आप भी अपने पौधे को पानी पिलाते रहना, कहीं ये सूख न जाए।



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