एक नया सफ़र आज से शुरू करने जा रहा हूँ। यह आर्टिकल उसका हिस्सा है। बरसों से लिखने की ख़्वाहिश लिए दिल चल रहा था, कभी पोएट्री, कभी ड्रामा तो कभी मूवी स्क्रिप्ट लिखी। लेकिन सारी हार्ड डिस्क पर रह गईं।
जब दिल ने सोचा कि क्या फ़ायदा उस राइटिंग का जो कभी पब्लिश न हो, भले कोई पढ़े न पढ़े, तुम लिखो। लिखना अगर तुम्हारे ज़ेहन को सुकून देता है तो यही सही।
ख़ैर, ज़िंदगी भी अजीब सी है। बचपन में बड़ा होना चाहते थे, और अब बच्चा बनना चाहते हैं। Millennials generation है ही ऐसी, थोड़ी sensitive।
क्योंकि बचपन में हमने parents की मार खाई और school में teachers ने भी कुटाई की थी। जब आज parents को देखते हैं या school में जाते हैं तो बच्चों को महाराजा की तरह रखा जाता है।
ख़ैर, जो कुटाई हमारी हुई थी उसी के बल पर पढ़-लिखकर शायद अच्छी job हासिल कर पाए, लेकिन किसे पता था life भी हमारी वाट लगाने वाली थी।
हम वो generation हैं जो manager के सामने नतमस्तक हुजूरी करते हैं और हमारे junior हमें मुँह पर बोलते हैं, लेकिन फिर भी हँसकर बाहर जाकर चाय की चुस्की लगाते हुए कभी cricket, कभी Bollywood, कभी politics तो कभी अपने निजी जीवन की बातें किया करते हैं।
शहर की गलियों में, mobile की screen पर और laptop के keypad पर इस कदर आज ज़िंदगी उलझी हुई है कि अंदर का भीतर एक बच्चा रो रहा है, किसी को सुनाई ही नहीं दे रहा। यही बच्चा जो nature का हिस्सा है, वो nature में घुलना चाहता है। इसे शहर के शोर से दूर चाहिए एक peaceful जगह।
ख़ैर, आज जो चाहिए वो सब कुछ है, अच्छी job, family, अपना घर, फिर भी एक खालीपन सा है जो दिल को सताए जा रहा है। और वो खालीपन पता नहीं क्या है, लेकिन जी चाहता है कि ऐसी जगह जाना जहाँ कोई न हो, सिर्फ़ मैं, मेरी book, pen और सिर्फ़ nature ही nature हो।
इन nature को camera में, अल्फ़ाज़ में, किताबों में इस कदर capture करना चाहता हूँ कि ये यादें कभी दिल से जुदा न हो जाएँ। जब भी इसे देखूँ, इसे पढ़ूँ, इसे सुनूँ तो जैसे पहले प्यार की तरह दिल को ताज़ा कर जाए।
अक्सर सुनाई दे रहा है कि लोगों में गुस्सा, बेसब्री आ गई है, लेकिन भीतर जो बच्चा परेशान कर रहा है उसकी आहट शायद कोई ही पहचान पाता है। इसी नतीजे में ये सारी दिमाग़ी हालत सामने आती है।
उस बच्चे को चाहिए कि बात करे ख़ुद से, आईने के सामने खड़े रहकर ख़ुद को ताड़े, अपनी hair style तराशे, ख़ुद को देखे, मुस्कुराए और ख़ुद से गुफ़्तगू करे। लेकिन ज़िम्मेदारी के तले या trend के ज़रिए उस बच्चे को अनसुना कर दिया जाता है।
ये सवाल आपसे है, आप बेसब्री से किसी से बातें करना चाहते हो, मिलना चाहते हो और वही शख़्स आपको नज़रअंदाज़ करे तो क्या आपको गुस्सा नहीं आएगा?
ज़िंदगी जीने के लिए होती है, इसे पास करने के लिए नहीं। काम ज़िंदगी के लिए होता है, ज़िंदगी काम के लिए नहीं। बस इतना फ़र्क समझ पाएँ तो हम खुशियों के रास्तों पर चल सकेंगे।
किसी ने सही कहा है, “सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग।”
आज इसी दौर में लोगों को impress करने में और social media को fake friends को दिखाने में ऐसे लगे हुए हैं कि ज़िंदगी का नाम ही ज़ुबान पर नहीं आ रहा। अरे, पैदल जा रहा हूँ, लोग क्या सोचेंगे, इसके पास गाड़ी नहीं?
अरे, ये गाड़ी पुराना model है, लोग हँसेंगे अगर महँगी car नहीं खरीदी। अरे, branded कपड़े नहीं पहने तो लोग बुलाएँगे नहीं। और इसी दौड़ में और social media के status में उलझते जा रहे हैं।
अरे, लोग मुझे नहीं बुलाएँगे, उस चक्कर में तू ख़ुद ही ख़ुद को बुला नहीं रहा भाई, ये तो सोच ज़रा।
लोगों की सही परवाह करो, लेकिन उनकी नफ़्सानी सोच का शिकार न बनो।
मैं पैदल जाऊँगा, मेरी health अच्छी रहेगी। गाड़ी के नीचे पैर नहीं निकाला और चल पड़ा gym, ये कैसा logic हो गया?
अरे, मेरी गाड़ी का model बेशक पुराना होगा, लेकिन उसका मक़सद सिर्फ़ मुझे travelling में help करना है। महँगी गाड़ी लेकर भी garage में ही park करना है।
Life जितनी private रहे उतनी सही रहे। घूमने जाओ, nature देखो और nature को camera में capture करो, ख़ुद को भी capture करो, selfie लो और बड़ा सा album बनाकर अपनी family के साथ देखकर खुश रहना ही ज़िंदगी है।
और family से मतलब जो घर में रहते हैं उनसे है, न कि दूर के रिश्तेदार जिनको impress करने में status पर status और WhatsApp group में photo की बारिश कर देते हैं।
Life में खुश रहने का एक ही मंत्र है, love yourself first. क्योंकि तुम ख़ुद को नहीं चाहोगे तो तुम family को कैसे चाहोगे?
एक बात है ना, ख़ुद नहीं खाओगे और भूखे रहोगे तो काम पर कैसे जाओगे? और काम पर नहीं जाओगे तो पैसे नहीं आएँगे, तो क्या तुम्हारे WhatsApp वाले चाहा पेट भरने आएँगे?
नहीं।
इसलिए ख़ुद पहले खाओ ताकि healthy रहो और थोड़ी मेहनत से अपने family का पेट भरो, उसे चाहो।
और जब भी लगे burnout हो रहा हूँ, stress आ रहा है, सबसे पहले अपनी रोज़ाना ज़िंदगी की गाड़ी को मारो brake। अपनी गाड़ी में बैठो या bus, train पकड़कर ऐसी जगह जाओ जहाँ सिर्फ़ तुम ही तुम हो और कोई नहीं, कोई शहर का शोर नहीं, कोई horn नहीं, कोई last task नहीं, कोई suggestion नहीं, कोई order नहीं, कोई status नहीं, कोई mobile नहीं, सिर्फ़ तुम, nature और तुम्हारी पसंदीदा activity।
जैसे मेरे case में, beach पर या jungle में खोना, book पढ़ना, उसे अल्फ़ाज़ में लिखना। शायद तुम्हारे case में trekking, photography हो सकती है।
तो ये था मेरा पहला article, मेरी journey, मेरी शुरुआत।
और अगर मेरे अल्फ़ाज़ सही लगे तो मुझे support ज़रूर कीजिएगा।
Life ऐसी हो जहाँ judgment की कोई जगह न हो, ना किसी के like-dislike और comment की परवाह।
नमस्ते।



Itna bhi Emotional post nahi karna tha Samira